महान प्रार्थना
उस प्रकाश-पुंज
से,
जहां विद्यमान
हैं संपूर्ण स्त्रोत,
आने दो रोशनी
को धरा पर
और प्रकाश
को मनुपुत्रों
के अंतर में समा
जाने दो ।
प्रेम बिंदु
से,
दिव्य-हृदय
में,
और प्रेम-सुधा
में हो जाने दो
मनु-हृदय
को ओत-प्रोत,
हों मानव
में जाग्रत ,
प्रेम व विवेक
के कुंभ-सिद्धांत
।
उस केंद्र
से,
जहां संपूर्ण
स्त्रोत की ऊर्जा
का ज्ञान है,
होने दो उसे
मानव-चेतना में
दिव्य-संकल्प
रूप ले प्रवाहित
।
है यही वह
संकल्प
हैं जानते
जिसे गुरूजन,
और हैं करते
वे जिसकी सेवा
।
मानव-जाति
नामक उस केंद्र से,
हो जाने दो
पूर्ण
प्रेम व विवेक
की योजना ।
कि करे बंद यह उन द्वारों
को
जिनके पीछे
पलती है बुराई
।
प्रकाश, प्रेम, विवेक
व अच्छाई
की शक्ति को
करने दो पुनरस्थापित
धरा पर योजना ।