Esoteric Society


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१. धरती व घूर्णन

धरती, जो हमारे इस भौतिक, द्वैतवादी जीवन का ग्रह है और जिसे हम धरती-माँ कहते हैं, तीव्र विक्षोभ में है । कई दुर्घटनाएं व मौसम में परिवर्तन हो रहे हैं । धरती अपने संतुलन को प्राप्त करने की कोशिश कर रही है अतः उसकी शुरुआत निकट है । अटलांटिस का पुनरुत्थान होगा । महाद्वीप विलुप्त हो जायेंगे और नये महाद्वीप उदित होंगे ।

जो भी दुर्घटनाएं और मौसम में बदलाव हो रहे हैं वे सभी उस ऊर्जा का निश्चित अंत हैं जो मानवता द्वारा पिछले पच्चीस हज़ार वर्षों में इस धरा पर लायी गई है । पश्चिमी गोलार्द्ध (उत्तरी और दक्षिणी अमरीका) में होने वाली सभी प्राकृतिक दुर्घटनाएं अटलांटिस के पत्तन से संबंधित हैं ।

कुंभ-युग में एक अधिक चैतन्य स्थिति प्राप्त करने के लिये पृथ्वी को एक अधिक ऊँचे चक्र में परिवर्तित हो नकारात्मक तत्त्वों को, विषेशकर धरती की धुरी में अत्याधिक बदलाव द्वारा, पीछे छोड़ना होगा । उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के बीच ऊर्जा क्षेत्रों में बदलाव होगा । इस प्रकार ध्रुवीकरण में बदलाव होता है । कई देशों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा । आज विद्यमान मानवता का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही बचेगा । जिस तकनीक पर इन्सान अब निर्भर करता है उसका अस्तित्व भी समाप्त हो जायेगा ।

इलैक्ट्रानिक, कंप्यूटर इत्यादि में हो रहे वर्तमान विकास को देखते हुए हम अटलांटिक युग से शुरू होने वाली तकनीक-रूपी नवीनीकृत ऊर्जा के उद्गम के बारे में बात कर सकते हैं । कुंभ-युग सूचना के विश्वव्यापी आदान-प्रदान और विश्व-बंधुत्व से युक्त संसार के विकास के अवसर की ओर पहला कदम है ।

कुंभ-युग नामक इस नये युग में नये प्रकार के जीव धरती पर जन्म लेंगे । मनुष्य भी अधिक स्पष्टवादी, सहजज्ञानिक और धरती पर अपने कर्त्तव्यों के प्रति अधिक सजग होगा । तब दूरंगामी संचार-तकनीक के विकास की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी । तब सूचनाओं का आदान-प्रदान विचार-अंतरण द्वारा होगा ।

धरती पर सभी तत्त्व संतुलित अवस्था प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं, परंतु वे, विशेषकर तब, यह संतुलन कभी प्राप्त नहीं कर पायेंगे क्योंकि धरती चलायमान नहीं होगी । संतुलन प्राप्त करने के प्रयास का अर्थ है मानव और धरती दोनों का विकास । मानव का विकास धरती की निरंतर गतिशीलता पर निर्भर करता है । चूंकि मानवमात्र में निरंतर गतिशीलता है इसीलिए मानव का विकास हो रहा है । सामंजस्य प्राप्त करने का प्रयास करते हुए विरोधी जोड़ों के कारण ही विकास का अस्तित्व है ।

संतुलित जोड़े तभी अस्तित्व में आयेंगे जब सभी तत्त्व संतुलित होंगे और सभी विरोधाभास निष्प्रभाव हो जायेंगे । तभी समरसता अस्तित्व में आयेगी । जब समरसता होती है तभी विकास पूरा होता है ।

चूंकि धरती सभी तत्त्वों को संतुलित करने की कोशिश करती है अतः हम नियमितता के विषय में बात कर सकते हैं ।

धरती उन सभी विभिन्न छोटे चक्रों को जानती है जो संतुलन प्राप्त करने का प्रयास करते हैं । धरती पर, जिसमें तत्त्व, मानवता, पशु-जगत और वनस्पति-जगत शामिल हैं, तीव्र गतिशीलता और विकास होता है । यह गतिशीलता सब में देखने को मिलती है । प्रत्येक वस्तु संतुलित अवस्था को प्राप्त करना चाहती है । क्या धरती इस संतुलन को कभी प्राप्त कर पायेगी या नहीं यह धरती और सभी वस्तुओं के वर्ग पर निर्भर करेगा ।

विभिन्न स्तरों पर, फिर चाहे वह आध्यात्मिक हो या भौतिक, संतुलन प्राप्त करने के प्रयास जारी हैं, विभिन्न स्थितियों का विकास हो रहा है । जब सभी तत्त्व और वस्तुएं संतुलन प्राप्त करने का प्रयास करती हैं तभी विकास होता है ।

धरती ने कई विकास देखे हैं । तथापि धरती को स्वयं को संतुलित करने और ब्रह्मांड-प्रकाश में परिवर्तित करने में अब भी कई करोड़ वर्ष लगेंगे ।

 


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